चोल-कालीन ‘लीडेन’ ताम्रपत्रों की स्वदेश वापसी
हाल ही में नीदरलैंड सरकार ने आधिकारिक तौर पर 11वीं शताब्दी के ऐतिहासिक अनैमंगलम ताम्रपत्रों (जिन्हें अकादमिक जगत में ‘लीडेन ताम्रपत्र’ – Leiden Copper Plates कहा जाता है) को भारत को सौंप दिया है। लगभग दो शताब्दियों (1862 से) तक लीडेन यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में संरक्षित इन शाही विलेखों को ‘द हेग’ में आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डच प्रधानमंत्री रॉब जेटन की उपस्थिति में भारत (ASI) को वापस किया गया।
यह पहला मौका है जब चोल काल के किसी ताम्रपत्र विलेख को वापस भारत लाया गया है, जिससे विदेशों में मौजूद अन्य प्राचीन तमिल शिलालेखों (जैसे ब्रिटिश संग्रहालय में रखे पाण्ड्य-कालीन वेल्विकुडी ताम्रपत्र) को वापस लाने की मांग तेज हो गई है।
अनैमंगलम ताम्रपत्र: धार्मिक सद्भाव और समुद्री कूटनीति का दस्तावेज़
ये ताम्रपत्र मध्यकालीन भारत के हिंद महासागर व्यापार, समुद्री इतिहास और अंतर-धार्मिक सह-अस्तित्व का एक अमूल्य पुरालेखीय स्रोत हैं:
- भूमि अनुदान (The Grant): इन पत्रों में नागपट्टिनम (तमिलनाडु) के पास स्थित अनैमंगलम गांव से प्राप्त होने वाले भूमि राजस्व को एक स्थानीय बौद्ध मठ के रखरखाव के लिए दान करने का विवरण है।
- श्रीविजय साम्राज्य से जुड़ाव: इस बौद्ध मठ का नाम ‘चूड़ामणिवर्मन विहार’ (या राजा राजा चोलन पेरुम्पल्ली) था। इसका निर्माण जावा/सुमात्रा (आधुनिक इंडोनेशिया) के श्रीविजय साम्राज्य के राजा श्री मार विजयोत्तुंग वर्मन ने अपने पिता के सम्मान में करवाया था।
- शाही संरक्षण: यह विलेख दर्शाता है कि कैसे कट्टर शैव (हिंदू) होने के बावजूद चोल सम्राटों ने एक विदेशी बौद्ध राजा के अनुरोध पर बौद्ध संस्थान को राजकीय संरक्षण और कर-मुक्त भूमि प्रदान की।
संरचना और पीढ़ियों का सातत्य (Cross-Generational Implementation)
यह पुरावशेष लगभग 30 किलोग्राम का एक प्रशासनिक दस्तावेज है, जो कुल 24 पत्रों का एक सेट है। यह दो अलग-अलग चोल शासकों के कालक्रम में विभाजित है:
1. बड़े लीडेन पत्र (21 ताम्रपत्र)
- शासक: सम्राट राजा राजा चोल प्रथम (985-1014 ईस्वी) ने इस भूमि अनुदान की मौखिक घोषणा ताड़ के पत्तों पर करवाई थी, जिसे उनके प्रतापी पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम (1014-1044 ईस्वी) ने स्थायी तांबे की चादरों पर उत्कीर्ण करवाकर कार्यान्वित किया।
- भाषा: इसमें 5 संस्कृत पत्र (जो चोल वंश की दिव्य वंशावली का वर्णन करते हैं) और 16 तमिल पत्र (जो अनैमंगलम गांव की सटीक राजस्व सीमाओं और कृषि छूटों का विवरण देते हैं) शामिल हैं।
2. छोटे लीडेन पत्र (3 ताम्रपत्र)
- शासक: कुलोत्तुंग चोल प्रथम (1070-1120 ईस्वी)।
- विवरण: दशकों बाद, जावानीस साम्राज्य के दो दूतों ने कुलोत्तुंग चोल प्रथम के दरबार में आकर इस अनुदान को जारी रखने की अपील की। सम्राट ने इस आदेश को पुनर्जीवित करते हुए बौद्ध संघ के लिए मूल अनुदान (8,943 ‘कलम’ धान) में 4,500 ‘कलम’ (धान की ऐतिहासिक माप इकाई) और अतिरिक्त भूमि की वृद्धि कर दी।
एक ऐतिहासिक क्षति: जहाँ ये ताम्रपत्र समय की मार से बच गए, वहीं तमिलनाडु में स्थित इस ऐतिहासिक ‘चूड़ामणिवर्मन विहार’ के भौतिक टॉवर (मठ संरचना) को वर्ष 1867 में ब्रिटिश मद्रास सरकार की स्पष्ट अनुमति से जेसुइट पादरियों द्वारा दुखद रूप से ध्वस्त कर दिया गया था।
चोल शाही मुहर (Royal Insignia) की संरचना
ये 24 बड़े और छोटे पत्र एक विशाल कांस्य की अंगूठी (रिंग) से आपस में बंधे हैं, जो पिघली हुई धातु से बनी चोल शाही मुहर द्वारा सील की गई है। यह मुहर मध्यकालीन दक्षिण भारत के भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन का एक दृश्य नक्शा प्रस्तुत करती है:
- चोल बाघ (The Tiger): यह चोल राजवंश का प्राथमिक शाही प्रतीक है, जिसे मुहर के केंद्र में प्रमुखता से दर्शाया गया है।
- जुड़वां मछलियाँ (Pandya Fish) और चेर धनुष (Chera Bow): ये क्रमशः पाण्ड्य और चेर राजवंशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हें रणनीतिक रूप से चोल बाघ के नीचे या उसके ठीक बगल में स्थापित किया गया है, जो दृश्य रूप से यह प्रमाणित करता है कि चोलों ने अपने इन दोनों क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया था।
- शाही राजचिह्न (Imperial Regalia): इस मुहर को दो चामर (fly-whisks), शाही छत्र (parasol), औपचारिक तेल के दीये और एक स्वास्तिक चिह्न से सुसज्जित किया गया है।
- अभिलेख: बड़े पत्रों की मुहर पर तमिल लिपि में ‘अनैमंगलम’ नाम और राजेंद्र चोल प्रथम की स्तुति में एक संक्षिप्त संस्कृत श्लोक है, जबकि छोटे छल्ले पर कुलोत्तुंग चोल प्रथम के सम्मान में एक श्लोक उत्कीर्ण है।
