दुनिया

समुद्री चोकपॉइंट्स का संकट: वैश्विक व्यापार की कमजोरी

हाल ही में ईरान की संसद ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों के प्रबंधन के लिए एक नए ‘पेशेवर तंत्र’ और फारस की खाड़ी जलडमरूमध्य प्राधिकरण (PGSA) की स्थापना की घोषणा की है। यह कदम वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है, क्योंकि यहीं से दुनिया का 20% तेल और एलएनजी (LNG) गुजरता है।

बंद महासागर’ की समस्या

हिंद महासागर वैश्विक व्यापार का केंद्र है, जहाँ से हर साल 1,00,000 जहाज गुजरते हैं, जो वैश्विक कंटेनर ट्रैफिक का 30% और समुद्री तेल व्यापार का 80% संभालते हैं। लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी भौगोलिक स्थिति है। अटलांटिक और प्रशांत महासागरों के विपरीत, हिंद महासागर ‘बंद’ है और इसका प्रवेश द्वार केवल कुछ चुनिंदा जलडमरूमध्यों से नियंत्रित होता है।

प्रमुख चोकपॉइंट्स और उनके सामने चुनौतियाँ:

  1. होर्मुज जलडमरूमध्य (फारस की खाड़ी का प्रवेश द्वार): ईरान द्वारा टोल प्रणाली को औपचारिक रूप देने से वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर दबाव बढ़ गया है। यह दुनिया के लिए ‘स्ट्रेटेजिक स्ट्रैंगलहोल्ड’ (रणनीतिक घेराबंदी) जैसा है।
  2. बाब-अल-मंडेब (पश्चिमी द्वार – ‘आंसुओं का द्वार’):
    • संकट: यहाँ हूती उग्रवादियों द्वारा लगातार मिलिटेंट हमले हो रहे हैं, जिससे 2026 में भी यातायात पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया है।
    • लागत: यदि जहाज यहाँ से नहीं गुजरते, तो ‘केप ऑफ गुड होप’ (अफ्रीका) का रास्ता अपनाना पड़ता है। यह यात्रा में 10-14 दिन का अतिरिक्त समय और प्रति ट्रिप लगभग $2 मिलियन का अतिरिक्त खर्च बढ़ाता है।
  3. मलक्का जलडमरूमध्य (पूर्वी द्वार – ‘मलक्का दुविधा’):
    • महत्व: वैश्विक समुद्री व्यापार का 24% और तेल शिपमेंट का 45% यहीं से गुजरता है।
    • जोखिम: अप्रैल 2026 में इंडोनेशिया द्वारा शुल्क लगाने के विचार ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी थी। यहाँ से बायपास (सुंडा/लोम्बोक जलडमरूमध्य) करने पर यात्रा में 5 दिन का अतिरिक्त समय लगता है और सिंगापुर जैसे महत्वपूर्ण रिफ्यूलिंग हब छूट जाते हैं।

चीन की ‘मलक्का दुविधा’

मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर को जोड़ने वाला सबसे छोटा समुद्री मार्ग है। चीन के लिए यह मार्ग उसकी “जीवन रेखा” है, लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी भी है। आखिर बीजिंग इस मार्ग को लेकर क्यों चिंतित है आदि आप जानना चाहते हैं तो मैं आपको बता दूँ कि चीन निम्न कारणों से चिंतित है;

  • ऊर्जा निर्भरता: चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक है। उसका 80% समुद्री तेल आयात मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। किसी भी तरह की नाकेबंदी चीन की अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति को तुरंत ठप कर सकती है।
  • भौगोलिक जाल: फिलिप्स चैनल पर यह जलमार्ग महज 1.7 मील चौड़ा है, जिसे आसानी से मॉनिटर या ब्लॉक किया जा सकता है।
  • अमेरिका और भारत का प्रभाव: चीन को डर है कि ताइवान या दक्षिण चीन सागर जैसे किसी विवाद के समय अमेरिका अपनी नौसेना से यहाँ नाकेबंदी कर सकता है। वहीं, भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह इस जलमार्ग के पश्चिमी प्रवेश द्वार पर स्थित हैं, जो भारत को जरूरत पड़ने पर चीनी जहाजों को रोकने की रणनीतिक क्षमता देते हैं।

बीजिंग इसे कैसे हल कर रहा है?

चीन ने इस ‘दुविधा’ से निपटने के लिए दशकों से अरबों डॉलर की रणनीति अपनाई है:

1. जमीनी गलियारे (Belt and Road Initiative): समुद्री मार्ग से बचने के लिए चीन ने वैकल्पिक लैंड-ब्रिज बनाए हैं:

  • चीन-म्यांमार कॉरिडोर (CMEC): म्यांमार के क्याउकफ्यू बंदरगाह से चीन तक सीधे पाइपलाइन।
  • चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC): अरब सागर के ग्वादर बंदरगाह को सीधे चीन से जोड़ने वाली सड़क और पाइपलाइन नेटवर्क।
  • रूस-मध्य एशिया: रूस और मध्य एशियाई देशों से आने वाली गैस पाइपलाइनें।

2. वैकल्पिक समुद्री मार्ग:

  • पोलर सिल्क रोड: आर्कटिक क्षेत्र के पिघलते बर्फ से बने नए समुद्री रास्तों का उपयोग।
  • थाईलैंड लैंड ब्रिज: मलक्का को बायपास करने के लिए थाईलैंड में हाईवे और रेल कॉरिडोर का निर्माण।
  • अन्य रास्ते: सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य का विकल्प, हालांकि ये मार्ग यात्रा का समय और लागत बहुत बढ़ा देते हैं।

3. नौसैनिक आधुनिकीकरण (‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’): यदि चीन इसे बायपास नहीं कर सकता, तो वह इसे सुरक्षित करने के लिए अपनी नौसेना को मजबूत कर रहा है। हिंद महासागर के बंदरगाहों (जैसे श्रीलंका का हंबनटोटा, जिबूती बेस) का एक नेटवर्क बनाया गया है, जिसे ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ कहा जाता है।

4. ऊर्जा का स्वदेशीकरण: चीन आयातित तेल पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की ओर तेजी से बढ़ रहा है और सौर/पवन ऊर्जा तथा परमाणु ऊर्जा में भारी निवेश कर रहा है। साथ ही, उसने बड़े पैमाने पर ‘स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ (SPR) बनाए हैं ताकि नाकेबंदी की स्थिति में भी देश महीनों तक चलता रहे।

चीन का मलक्का दुविधा से निकलने का संघर्ष यह दर्शाता है कि भविष्य के युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखलाओं और रणनीतिक बंदरगाहों के नियंत्रण से लड़े जाएंगे। भारत के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक सबक है।

कौन नियंत्रित करेगा वैश्विक अर्थव्यवस्था?

आधुनिक दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और उपभोक्ता वस्तुओं का प्रवाह इन संकीर्ण मार्गों पर टिका है। जैसा कि ईरान होर्मुज में अपनी शक्ति का परीक्षण कर रहा है, दुनिया के लिए संदेश स्पष्ट है: जो इन जलडमरूमध्यों को नियंत्रित करता है, वही वैश्विक अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करता है।” इन चोकपॉइंट्स की नाजुकता ने साबित कर दिया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला किसी भी समय एक बड़े संकट की चपेट में आ सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *