भारत-साइप्रस संबंध में प्रगाढ़ता और पाकिस्तान-तुर्की को कड़ा संदेश
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शुक्रवार को हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स के बीच हुई मुलाकात कोई सामान्य कूटनीतिक बैठक नहीं थी। इस मुलाक़ात ने भारत-साइप्रस संबंध को प्रगाढ़ बनाया है और बेहद उथल-पुथल वाले पूर्वी भूमध्यसागरीय (Eastern Mediterranean) क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पहुंच को विस्तार दिया है।
दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को “रणनीतिक साझेदारी” (Strategic Partnership) के दर्जा तक बढ़ाया है। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार किया है। भारत-साइप्रस संबंध यूरोप और मध्य पूर्व (Middle East) के चौराहे पर अपने गठबंधनों को सक्रिय रूप से नया आकार दे रही है। भू-राजनीति की बिसात पर नज़र रखने वालों के लिए, शुक्रवार को हुए समझौतों के पीछे छिपे कूटनीतिक संदेश भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
भारत-साइप्रस संबंध: तुर्की के लिए एक स्पष्ट चेतावनी
इस संयुक्त बयान का शायद सबसे प्रभावशाली क्षण वह था, जब पीएम मोदी ने जानबूझकर अंतरराष्ट्रीय कानून पर ज़ोर दिया। यह कहते हुए कि भारत-साइप्रस संबंध “संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान” पर आधारित हैं, प्रधानमंत्री ने एक स्पष्ट लकीर खींच दी।
भूमध्यसागरीय क्षेत्र भू-राजनीति का जटिल मंच है, इस बयान को सार्वभौमिक रूप से तुर्की के खिलाफ निकोसिया (साइप्रस की राजधानी) के साथ भारत की एकजुटता के रूप में देखा जा रहा है। गौरतलब है कि तुर्की ने उत्तरी साइप्रस पर कब्ज़ा कर रखा है और उसे एक अलग राज्य मानता है। ऐसे समय में जब तुर्की पूरे क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है (और अक्सर भारत के आंतरिक मामलों में भी बयानबाज़ी करता रहा है), साइप्रस की संप्रभुता का भारत द्वारा खुला समर्थन एक तीखा और अचूक संदेश देता है।
रक्षा निर्यात में भारत की बड़ी छलांग
भारत अब वैश्विक रक्षा बाज़ार में सिर्फ एक खरीदार नहीं रह गया है; वह सक्रिय रूप से एक ‘आपूर्तिकर्ता’ (Supplier) के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। भारत-साइप्रस संबंध का रणनीतिक साझेदारी के रूप में उन्नत होना दोनों देशों के लिए अच्छा माना जा रहा है। इसके साथ ही दोनों देशों ने रक्षा संबंध को बढ़ाने हेतु एक मजबूत रक्षा रोडमैप भी बनाया है:
- सैन्य हार्डवेयर की खरीद: निकोसिया ने आधिकारिक तौर पर भारतीय रक्षा उद्योग से सीधे सैन्य हार्डवेयर खरीदने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है।
- उद्योगों के बीच सहयोग: इसे सुगम बनाने के लिए, ‘साइप्रस डिफेंस एंड स्पेस इंडस्ट्रीज क्लस्टर’ और ‘सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स’ (SIDM) के बीच एक अहम समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
- भविष्य की तकनीक: दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और उभरती प्रौद्योगिकियों (emerging technologies) के क्षेत्र में सहयोग को गहरा करने की प्रतिबद्धता जताई है।
IMEEC की संजीवनी और यूरोप का ‘प्रवेश द्वार’
रक्षा क्षेत्र से इतर, इस साझेदारी के आर्थिक और लॉजिस्टिक मायने बहुत बड़े हैं—खासकर तब जब मध्य पूर्व में चल रहे तनाव (ईरान-इज़रायल संघर्ष) ने वैश्विक सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है।
साइप्रस, जिसके पास वर्तमान में यूरोपीय संघ (EU) की परिषद की अध्यक्षता है, खुद को भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEEC) को जीवित रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्थापित कर रहा है। साइप्रस के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि वे यूरोपीय संघ के भीतर ‘फ्रेंड्स ऑफ IMEEC’ समूह बनाकर इस पहल को ऊर्जा दे रहे हैं। वे क्षेत्रीय संघर्षों से प्रभावित वैश्विक कार्गो को नया रास्ता देने के लिए अपनी ‘ट्रांसशिपमेंट’ सुविधाओं की पेशकश भी कर रहे हैं।
यूरोपीय संघ हेतु निवेश द्वार
राष्ट्रपति क्रिस्टोडौलाइड्स और पीएम मोदी, दोनों ने ही साइप्रस को यूरोप में भारत के प्राथमिक “निवेश द्वार” (Investment Gateway) के रूप में पेश किया है। इसका उद्देश्य हाल ही में संपन्न हुए ‘भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते‘ का पूरा लाभ उठाना है। इस आर्थिक गलियारे के पहियों को और तेज़ करने के लिए, दोनों पक्षों ने जल्द ही दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें (Direct Flights) शुरू करने की भी घोषणा की है।
साइप्रस के साथ भारत का यह जुड़ाव ‘बहु-आयामी कूटनीति’ (Multi-vector Diplomacy) का एक मास्टरक्लास है। रक्षा हार्डवेयर का वादा करके और निकोसिया की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करके, नई दिल्ली एक ही तीर से तुर्की के प्रभाव को संतुलित कर रही है। साथ ही, साइप्रस को संकटग्रस्त IMEEC प्रोजेक्ट के एंकर और यूरोपीय संघ के प्रवेश द्वार के रूप में उपयोग करके, भारत मध्य पूर्व की उथल-पुथल के बावजूद यूरोप के लिए अपने व्यापारिक मार्गों को आक्रामक रूप से सुरक्षित कर रहा है। पूर्वी भूमध्यसागर की भू-राजनीति करवट ले रही है, और भारत ने आधिकारिक तौर पर इस महत्वपूर्ण मेज़ पर अपनी सीट पक्की कर ली है।
