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भारत का डेमोग्राफिक टर्निंग पॉइंट: SRS 2024 के आंकड़ों में शानदार सुधार

हाल ही में जारी ‘सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे’ 2024 (SRS 2024) के आंकड़े सामने आए हैं और ये भारत में हो रहे बड़े डेमोग्राफिक बदलावों (जनसांख्यिकीय संक्रमण) की एक बेहद साफ और अहम तस्वीर पेश करते हैं।

एक देश के रूप में हम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। पिछले एक दशक (2014-2024) में, भारत ने राष्ट्रीय जन्म दर में लगातार गिरावट देखी है और अपने नौनिहालों की जान बचाने में शानदार कामयाबी हासिल की है। लेकिन आंकड़ों को करीब से देखने पर एक कड़वा सच भी सामने आता है: ग्रामीण और शहरी भारत के बीच की गहरी और जिद्दी खाई।

लब्बोलुआब यह है: कागज़ पर राष्ट्रीय औसत बहुत अच्छे दिख रहे हैं, लेकिन इन्हें असली पंख शहरों की कामयाबी से मिले हैं, जबकि ग्रामीण इलाके अभी भी इस रफ्तार में पीछे छूट रहे हैं।

सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे: एक दशक की राष्ट्रीय प्रगति

कुल मिलाकर देखा जाए तो पिछले एक दशक में शुरू की गई केंद्र और राज्य स्तर की हेल्थकेयर पहलों के नतीजे साफ नजर आ रहे हैं:

  • गिरती जन्म दर (Falling Birth Rates): राष्ट्रीय जन्म दर (प्रति 1,000 जनसंख्या पर जीवित जन्म) 2014 के 21 से काफी गिरकर 2024 में 18.3 हो गई है।
  • स्थिर मृत्यु दर (Stable Death Rates): राष्ट्रीय मृत्यु दर में मामूली लेकिन सकारात्मक गिरावट आई है, जो 6.7 से घटकर 6.4 (प्रति 1,000 व्यक्ति) हो गई है।
  • शिशुओं की जान बचाना (Saving Infants): सबसे बड़ी और काबिले तारीफ जीत हमारी शिशु मृत्यु दर (IMR) में है। 10 सालों में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर शिशु मृत्यु का आंकड़ा 39 से लुढ़क कर 24 पर आ गया है।

ये आंकड़े वाकई तालियों के हकदार हैं। लेकिन जैसा कि खबरों को बारीकी से समझने वाले जानते हैं, असली सच्चाई हमेशा ‘डेटा के भीतर के डेटा’ (Disaggregated data) में छिपी होती है।

शहरी रफ्तार बनाम ग्रामीण सुस्ती: असली फासला

जब हम इन आंकड़ों को ‘गांव और शहर’ के चश्मे से देखते हैं, तो जश्न का माहौल एक चिंता में बदल जाता है और समान विकास (Equitable Growth) की जरूरत महसूस होती है।

शहरी भारत तेजी से स्थिर हो रहा है। पिछले एक दशक में, शहरी जन्म दर 17.4 से गिरकर 14.7 पर आ गई है। इसके उलट, ग्रामीण जन्म दर 22.7 से गिरकर 20.2 पर जरूर आई है, लेकिन यह अब भी काफी ज्यादा है।

मृत्यु दर भी यही कहानी कहती है। ग्रामीण मृत्यु दर 7.3 से सुधरकर 6.8 हुई है। दिलचस्प बात यह है कि शहरी मृत्यु दर 5.5 से मामूली बढ़कर 5.6 हो गई है—जो शायद शहरी आबादी के बुजुर्ग होने (Aging urban population) का संकेत है—लेकिन फिर भी यह ग्रामीण आंकड़ों से काफी बेहतर है।

शिशु मृत्यु दर की खाई: सबसे बड़ी चुनौती

हमारे हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर का असली लिटमस टेस्ट ‘शिशु मृत्यु दर’ (IMR) है, और यहीं पर शहर-गांव का अंतर सबसे ज्यादा चुभता है।

शहरी भारत इसमें बाजी मार रहा है। उसने अपनी IMR को 9 अंक घटाकर 26 से 17 कर लिया है। वहीं, ग्रामीण भारत ने भी कमाल किया है और इसी अवधि में 16 अंकों की भारी गिरावट (43 से 27) दर्ज की है। लेकिन, ग्रामीण IMR का 27 पर होने का सीधा सा मतलब है कि हम अब भी अपने गांवों में बहुत से नवजात बच्चों को खो रहे हैं। भारत ने अपनी शिशु मृत्यु दर को ‘सिंगल डिजिट’ (इकाई अंक) में लाने का जो बड़ा लक्ष्य रखा है, गांव अभी उससे बहुत दूर हैं।

नीति निर्माताओं के लिए क्या है संदेश?

SRS 2024 का बुलेटिन नीति निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है। पूरे देश के लिए एक जैसी ‘ब्लैंकेट’ स्वास्थ्य नीतियां (Blanket policies) बनाने का दौर अब पीछे छूटना चाहिए। हमने साबित कर दिया है कि हम आंकड़ों को नीचे ला सकते हैं; हमारी मशीनरी काम करती है। लेकिन यह असमान प्रगति इस बात पर जोर देती है कि अब संसाधनों और फंड को सीधे तौर पर ‘ग्रामीण जिलों’ में झोंकने की तत्काल आवश्यकता है।

भारत का जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic transition) तब तक पूरी तरह सफल नहीं माना जाएगा, जब तक कि किसी दूर-दराज के गांव में पैदा होने वाले बच्चे के जीवित रहने और फलने-फूलने की संभावना (Statistical chance), किसी महानगर में पैदा होने वाले बच्चे के बराबर न हो जाए। जब तक हम इस खाई को नहीं पाटते, हमारे राष्ट्रीय औसत सिर्फ ‘आधी कहानी’ ही बयां करते रहेंगे।

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