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स्मार्ट बॉर्डर और घुसपैठ पर जीरो टॉलरेंस

भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति में एक बड़े और आक्रामक बदलाव का संकेत देते हुए, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को एक बेहद सख्त दो-तरफा रणनीति का ऐलान किया है: पहला, सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर पूर्ण रोक, और दूसरा, देश में पहले से मौजूद घुसपैठियों को व्यवस्थित तरीके से बाहर निकालना।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर गृह मंत्रालय की चिर-परिचित सख्ती के साथ बोलते हुए, शाह ने साफ कर दिया कि सरकार अब सीमाओं पर सिर्फ ‘डिफेंस’ (बचाव) की मुद्रा में नहीं है। अब फोकस देश के भीतर सक्रिय कार्रवाई पर शिफ्ट हो रहा है, ताकि देश में हो रहे अप्राकृतिक जनसांख्यिकीय बदलावों” (Unnatural demographic changes) को रोका जा सके।

आइए समझते हैं गृह मंत्री के इस नए सिक्योरिटी रोडमैप के मायने क्या हैं और भारत के सीमा प्रबंधन (Border Management) के लिए इसका क्या अर्थ है।

डेमोग्राफी बचाने की नई रणनीति (The Demographic Defense)

सालों से अवैध इमिग्रेशन (घुसपैठ) को लेकर राजनीतिक और सुरक्षा बहसें होती रही हैं। लेकिन शुक्रवार के बयान ने सरकार के रुख को एक ठोस और एक्शन वाली नीति में बदल दिया है। घुसपैठ को सीधे तौर पर “अप्राकृतिक जनसांख्यिकीय बदलावों” से जोड़कर, शाह ने यह साफ कर दिया है कि सीमा सुरक्षा अब सिर्फ जमीन और सरहद की रक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने (Socio-cultural fabric) को बचाने की लड़ाई है।

संदेश बिल्कुल साफ है: सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल अब सिर्फ ‘सामने का दरवाजा’ बंद करने के लिए नहीं होगा, बल्कि उन लोगों की पहचान कर उन्हें बाहर निकालने के लिए भी होगा जो पहले ही अंदर घुस चुके हैं।

स्मार्ट बॉर्डर’ का अहम वादा

सरकार इस बड़े लक्ष्य को हासिल कैसे करेगी? इसका जवाब हमारी सरहदों की सुरक्षा के होने वाले एक बड़े ‘टेक्नोलॉजिकल मेकओवर’ (तकनीकी बदलाव) में छिपा है।

शाह ने जल्द ही एक व्यापक स्मार्ट बॉर्डर” (Smart Border) कॉन्सेप्ट पेश करने का संकेत दिया है। भारत-पाकिस्तान या भारत-बांग्लादेश सीमा को करीब से जानने वाला कोई भी व्यक्ति यह समझता है कि इन सीमाओं के चप्पे-चप्पे पर जवानों को तैनात करके निगरानी करना एक बेहद मुश्किल काम है। यहाँ ऊबड़-खाबड़ इलाके, नदियां, दलदल और घने जंगल हैं जो गश्त लगाना नामुमकिन बना देते हैं।

‘स्मार्ट बॉर्डर’ पहल का लक्ष्य इन सीमाओं को पूरी तरह से “अभेद्य” (Impregnable) बनाना है। हालांकि सटीक तकनीकी खाका अभी सामने आना बाकी है, लेकिन अनुभवी सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इसमें इन चीजों पर सबसे ज्यादा जोर होगा:

  • एडवांस सर्विलांस (उन्नत निगरानी): अंधेरे और मुश्किल जगहों (Blind spots) पर हलचल पकड़ने के लिए ड्रोन, थर्मल इमेजिंग और अंडरग्राउंड सेंसर का भारी इस्तेमाल।
  • इंटीग्रेटेड कमांड सेंटर: सीमा चौकियों और केंद्रीय कमांड के बीच रियल-टाइम (तुरंत) डेटा और जानकारी शेयर करने की सुविधा।
  • खामियों को भरना: मुश्किल इलाकों में कंटीले तारों की जगह “लेजर वॉल” (Laser Walls) और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस ग्रिड लगाना।

आगे की राह: नीति से नतीजे तक

यह सुरक्षा के नजरिए में एक बहुत बड़ा बदलाव है। जवानों की फिजिकल गश्त से हटकर तकनीक-आधारित “स्मार्ट बॉर्डर” की तरफ बढ़ना, भारत के सीमा प्रबंधन को 21वीं सदी में ले जाता है।

हालांकि, इस नीति का असली इम्तिहान जमीन पर इसे लागू करने में होगा। एक-एक घुसपैठिए” को बाहर निकालने का संकल्प लेना एक बहुत बड़ी कानूनी और प्रशासनिक चुनौती है। इसके लिए पहचान की पुख्ता प्रक्रिया, केंद्रीय एजेंसियों और राज्य पुलिस के बीच जबर्दस्त तालमेल, और घुसपैठियों के डिपोर्टेशन (निर्वासन) के लिए पड़ोसी देशों के साथ जटिल कूटनीति की जरूरत होगी।

सुरक्षा का खाका तैयार हो चुका है। अब सबकी निगाहें ‘स्मार्ट बॉर्डर’ तकनीक के लागू होने और उसके बाद जमीन पर होने वाले ऑपरेशन्स पर टिकी होंगी। एक बात तो तय है: भारत की सरहदों की सुरक्षा में एक बड़ा अपग्रेड होने जा रहा है, और अवैध तरीके से सीमा पार करने वालों के लिए सरकार की ‘टॉलरेंस’ (बर्दाश्त) अब आधिकारिक तौर पर जीरो’ हो गई है।

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