लोकसभा में पेपर लीक संशोधन विधेयक पर तीखी बहस
नई दिल्ली: मंगलवार को लोकसभा में माहौल उस समय बेहद गर्म हो गया जब सदन ने ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पर चर्चा शुरू की। पेपर लीक की घटनाओं को रोकने के लिए लाए गए इस कड़े विधेयक को लेकर सत्तापक्ष (ट्रेजरी बेंच) और विपक्ष के बीच जबरदस्त नोकझोंक हुई। जहाँ सरकार ने इसे छात्रों के हित में एक “मील का पत्थर” बताया, वहीं विपक्ष ने इसे अपनी विफलता छिपाने की कवायद करार दिया।
सजा और जुर्माने का कड़ा प्रावधान
यह प्रस्तावित विधेयक 2024 के मौजूदा एंटी-पेपर लीक कानून को और अधिक सख्त बनाने की वकालत करता है। नए संशोधनों के तहत, पेपर लीक और संगठित परीक्षा अपराधों में शामिल पाए जाने वालों के लिए 10 साल तक की कैद और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
सरकार का पक्ष: बच्चों के भविष्य से समझौता नहीं
विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह संशोधन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दृढ़ संकल्प को दर्शाता है कि बच्चों के भविष्य के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने इसे संसद के इतिहास में एक “ऐतिहासिक” विधान बताया।
जितेंद्र सिंह ने जोर देकर कहा, “पेपर लीक की घटनाएं विभिन्न राज्यों में हुई हैं, जहाँ अलग-अलग दलों की सरकारें हैं। यह विधेयक छात्रों और युवाओं के कल्याण को सुरक्षित करने की सरकार की प्रतिबद्धता की पुष्टि है।”
त्वरित न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट
कानून मंत्री ने सदन को सूचित किया कि विधेयक में सार्वजनिक परीक्षाओं से संबंधित अपराधों से निपटने के लिए विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इन अदालतों की स्थापना के लिए कदम उठाना शुरू कर दिया है।
प्रस्तावित कानून में यह परिकल्पना की गई है कि चार्जशीट दाखिल होने की तारीख से दो महीने के भीतर जांच और तीन महीने के भीतर सुनवाई (ट्रायल) पूरी की जाए। इसके अलावा, विधेयक केंद्र सरकार को इन अपराधों की जांच के लिए एक ‘विशेष टास्क फोर्स’ (STF) गठित करने और उसे मामला सौंपने का अधिकार भी देता है।
विपक्ष का हमला: “दिखावटी कसरत”
विपक्ष की ओर से बहस की शुरुआत करते हुए कांग्रेस के उप नेता गौरव गोगोई ने सरकार की मंशा पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि जिस कानून को दो साल पहले सरकार ने “ऐतिहासिक” बताया था, उसमें इतने बड़े बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी?
गोगोई ने इस विधेयक को महज एक “दिखावटी कसरत” बताया और कहा कि यह उस 2024 के कानून की विफलता का प्रमाण है, जिसे पिछले NEET-UG विवाद के बाद लाया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक शिक्षा प्रणाली में ढांचागत सुधार नहीं होंगे, केवल कठोर सजा से इस खतरे को खत्म नहीं किया जा सकता।
NTA और सरकार की क्षमता पर सवाल
कांग्रेस नेता गोगोई ने सरकार पर सार्वजनिक परीक्षाओं की अखंडता की रक्षा करने में असमर्थ होने का आरोप लगाया। उन्होंने राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों के भविष्य पर सवाल उठाए और पूछा कि सरकार ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) से जिन 47 अधिकारियों को हटाने का दावा किया है, उनके विवरण क्या हैं। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा, “NTA की स्वीकृत संख्या जब केवल 34 है, तो ये 47 लोग कौन हैं जिन्हें हटाया गया?” उन्होंने NTA चेयरमैन की पृष्ठभूमि पर भी सवाल उठाए।
