अर्थव्यवस्था

जून 2026 में भारत की औद्योगिक वृद्धि दर 23 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंची

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग), बिजली और पूंजीगत वस्तुओं (कैपिटल गुड्स) के मजबूत प्रदर्शन के बल पर जून 2026 में भारत की औद्योगिक विकास दर 7.3% के लगभग दो साल (23 महीने) के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।

हालांकि, विश्लेषकों ने आगाह किया है कि सामान्य से कम मानसूनी बारिश की संभावना और पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी युद्ध के कारण बनी अनिश्चितता के चलते यह मजबूत प्रदर्शन आगे भी जारी रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) के प्रमुख आंकड़े

  • 23 महीने का उच्चतम स्तर: जून 2026 में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की 7.3% की वृद्धि दर जुलाई 2024 के बाद से सबसे तेज रही। मई 2026 में यह आंकड़ा 5.1% दर्ज किया गया था।
  • विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector): विनिर्माण क्षेत्र ने जून 2026 में 7.8% की 23 महीने की सबसे तेज वृद्धि दर दर्ज की। तुलनात्मक रूप से, मई 2026 में यह 5.5% और पिछले वर्ष (जून 2025) में 2.4% थी।
  • बिजली क्षेत्र (Electricity Sector): जून में देश के कई हिस्सों में पड़ी भीषण गर्मी (हीटवेव) के कारण बिजली और गैस आपूर्ति क्षेत्र की वृद्धि दर बढ़कर 10.6% के 25 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, जो मई में 9.9% थी।
  • पूंजीगत वस्तुएं (Capital Goods): पूंजीगत वस्तु क्षेत्र की वृद्धि दर जून 2026 में तेजी से बढ़कर 14.2% हो गई, जो पिछले साल जून में 3.45% थी। इसके अलावा, मध्यवर्ती वस्तुओं (Intermediate Goods) में 9.3% की वृद्धि हुई, जो निकट भविष्य में आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता को दर्शाती है।

विशेषज्ञों की राय और भविष्य का परिदृश्य

“यह तीव्र उछाल औद्योगिक गतिविधियों में व्यापक मजबूती को दर्शाता है, जिसे बेहतर विनिर्माण उत्पादन, मजबूत घरेलू मांग और निवेश-संचालित क्षेत्रों में निरंतर गति का समर्थन प्राप्त है।”

शाश्वत सिंह, फंडामेंटल एनालिस्ट, बजाज ब्रोकिंग

आगामी महीनों के लिए जोखिम व चिंताएं:

ब्रिकवर्क रेटिंग्स के एसोसिएट डायरेक्टर विक्रांत चतुर्वेदी के अनुसार, यद्यपि पूंजीगत व्यय में गति दिख रही है, लेकिन आगे का आर्थिक परिदृश्य जोखिमों से घिरा है:

  1. कम मानसून का प्रभाव: सामान्य से कम मानसून की संभावना ग्रामीण खपत को नुकसान पहुंचा सकती है और मुद्रास्फीति (महंगाई) पर दबाव बढ़ा सकती है।
  2. पश्चिम एशिया में तनाव: क्षेत्रीय संघर्षों के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा जोखिम है।

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