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मानसून अटका: 4 जून को केरल में दस्तक की उम्मीद

नई दिल्ली — भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मंगलवार को दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन की तारीख को आधिकारिक तौर पर आगे बढ़ा दिया। विभाग ने स्वीकार किया है कि यह महत्वपूर्ण मौसम प्रणाली अपनी पहले से अनुमानित अवधि से चूक जाएगी और अब गुरुवार, 4 जून के आसपास केरल में दस्तक दे सकती है।

यह देरी एक अप्रत्याशित झटके की तरह है। इससे पहले 15 मई को मौसम अधिकारियों ने बड़े भरोसे के साथ इसके 26 मई को जल्दी आने की बात कही थी। यदि मॉडल की मानक चार-दिन की संभावित त्रुटि (error) को भी ध्यान में रखा जाए, तो भी 4 जून की नई समयसीमा सबसे अंतिम संभावित तारीख (30 मई) को पार कर जाती है।

यह साल 2015 के बाद पहला मौका है जब आईएमडी का विशेष ऑपरेशनल पूर्वानुमान मॉडल मुख्य भूमि पर मानसून की शुरुआत का सटीक अनुमान लगाने में विफल रहा है। साल 2005 से 2025 के बीच विभाग के पूर्वानुमान सिर्फ एक ही बार चूके थे।

आखिर कहाँ अटका है मानसून?

आईएमडी के अधिकारियों के अनुसार, मानसून कमजोर नहीं पड़ा है—यह सिर्फ एक जगह थम गया है। मानसून की “उत्तरी सीमा” (northern limit)—जो मूल रूप से विशाल बादल प्रणाली की अगली कतार होती है—भारतीय मुख्य भूमि से कुछ ही दूरी पर अटकी हुई है।

हालांकि, इसे आगे बढ़ाने के लिए एक मौसम संबंधी मदद आ रही है। दक्षिणी केरल तट के पास हवा के ऊपरी हिस्से में एक चक्रवाती परिसंचरण (cyclonic circulation) बन रहा है, जिससे उम्मीद है कि यह बादलों को तट की ओर धकेलने में मदद करेगा। नतीजतन, आईएमडी ने अगले छह से सात दिनों के दौरान केरल में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की है।

मौसम ब्यूरो के अधिकारियों ने पत्रकारों को बताया कि 4 जून तक मानसून के दक्षिण-पूर्वी अरब सागर, केरल के कुछ हिस्सों, तमिलनाडु और बंगाल की खाड़ी में आगे बढ़ने के लिए स्थितियां आखिरकार “अनुकूल” हो रही हैं।

मानसून की ‘शुरुआत’ (Onset) का वैज्ञानिक पैमाना

आईएमडी केवल भारी मूसलाधार बारिश होने पर ही मानसून के आगमन की घोषणा नहीं कर देता है बल्कि इसके लिए एक सख्त और वैज्ञानिक चेकलिस्ट का पालन किया जाता है। मानसून की शुरुआत की आधिकारिक घोषणा करने के लिए 10 मई के बाद एक साथ तीन शर्तों का पूरा होना जरूरी है:

  • रेन गेज टेस्ट: केरल और पड़ोसी तटों पर स्थित 14 निर्धारित मौसम स्टेशनों (जिनमें कोच्चि, तिरुवनंतपुरम, कोझिकोड और मंगलुरु शामिल हैं) में से कम से कम 60% स्टेशनों पर लगातार दो दिनों तक 2.5 मिमी या उससे अधिक बारिश दर्ज होनी चाहिए।
  • हवा कारक: दक्षिण-पूर्वी अरब सागर के ऊपर मजबूत पश्चिमी हवाएं वायुमंडल में गहराई तक, लगभग 4.5 किमी की ऊंचाई तक फैली होनी चाहिए।
  • बादलों की परत : आउटगोइंग लॉन्ग-वेव रेडिएशन (बाहर जाने वाले दीर्घ-तरंग विकिरण) का स्तर 200 वाट प्रति वर्ग मीटर से नीचे गिरना चाहिए। यह एक सैटेलाइट पैमाना है जो यह साबित करता है कि आसमान में केवल सामान्य गर्मियों की बौछारें नहीं, बल्कि मानसून के गहरे और घने बादल मौजूद हैं।

कृषि अर्थव्यवस्था के लिए दांव पर बहुत कुछ

इस देरी ने पहले से ही कृषि परिदृश्य की तनावपूर्ण बना कर चिंता को और बढ़ा दिया है। इस साल प्रशांत महासागर में मजबूत होते अल नीनो (El Niño) के प्रभाव के कारण मानसून के पहले से ही “सामान्य से कम” यानी दीर्घकालिक औसत का सिर्फ 90% रहने का अनुमान लगाया गया है। भारतीय कृषि इन गर्मियों की बारिश पर अत्यधिक निर्भर है, इसलिए वैज्ञानिक और किसान दोनों ही इस गुरुवार को आसमान की ओर टकटकी लगाए देख रहे होंगे कि क्या मानसून अपनी इस नई तारीख पर कदम रखता है या नहीं।

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