NFHS-6: महामारी के बाद भारत ने बाल स्वास्थ्य और मातृ देखभाल में सुधार
नई दिल्ली: भारत ने महामारी के बाद के दौर में संस्थागत प्रसव में वृद्धि, बेहतर टीकाकरण कवरेज और बाल कुपोषण में उल्लेखनीय गिरावट के कारण प्रमुख मातृ और बाल स्वास्थ्य संकेतकों में महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किए हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा शुक्रवार को जारी ये निष्कर्ष अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (IIPS) के सहयोग से 2023 और 2024 में आयोजित बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) से प्राप्त हुए हैं। कोविड-19 महामारी के बाद के इस पहले बड़े जनसांख्यिकीय सर्वेक्षण के आंकड़े भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में सुधार की एक आश्वस्त करने वाली तस्वीर पेश करते हैं, हालांकि यह जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों और सिजेरियन प्रसव में तेज उछाल को लेकर नई चिंताएं भी पैदा करता है।
मुख्य स्वास्थ्य संकेतक: एक नज़र में (Key Health Indicators at a Glance)
पिछली NFHS-5 अवधि (2019-2021) की तुलना में प्रमुख स्वास्थ्य और पोषण मापदंडों में लगातार प्रगति देखी गई है:
| स्वास्थ्य संकेतक (Health Indicator) | पिछला (NFHS-5) | वर्तमान (NFHS-6) |
| संस्थागत प्रसव (Institutional Deliveries) | 88.6% | 90.6% |
| बाल स्टंटिंग / नाटापन (5 वर्ष से कम) | 35.5% | 29.3% |
| गंभीर बाल वेस्टिंग / सूखापन | 7.7% | 5.2% |
| पूर्ण टीकाकरण (12-23 महीने) | 83.8% | 87.1% |
| गर्भनिरोधक प्रसार (Contraceptive Prevalence) | 66.7% | 69.1% |
बाल स्वास्थ्य और पोषण: बदलती स्थिति (Child Health and Nutrition)
- कुपोषण में कमी: NFHS-6 का सबसे उत्साहजनक पहलू बाल कुपोषण में वास्तविक कमी आना है। दीर्घकालिक कुपोषण के महत्वपूर्ण संकेतक—पचास वर्ष से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग (नाटापन)—में छह प्रतिशत अंक से अधिक की गिरावट आई है।
- कम वजन वाले बच्चे: सर्वेक्षण में कम वजन (underweight) वाले बच्चों में मामूली गिरावट दर्ज की गई, जो अब 31.8% पर स्थिर हो गया है।
- सामान्य बीमारियां: सामान्य बीमारियों के प्रति बच्चों की संवेदनशीलता भी कम हुई है। बच्चों में तीव्र श्वसन संक्रमण (ARI) के लक्षण घटकर 1.9% (जो पहले 2.8% थे) रह गए हैं, और गंभीर डायरिया का प्रसार घटकर केवल 0.5% हो गया है।
- स्तनपान: इसके अलावा, शिशु आहार प्रथाएं मजबूत बनी हुई हैं, जहां छह महीने से कम उम्र के 95.6% शिशुओं को विशेष रूप से स्तनपान कराया जा रहा है।
सिजेरियन सेक्शन (C-Section) में उछाल: एक बढ़ती चिंता
- प्रसव पूर्व देखभाल (ANC): हालांकि मातृ देखभाल तक पहुंच में नाटकीय रूप से विस्तार हुआ है—जिसके तहत अब 95.9% गर्भवती महिलाएं प्रसव पूर्व देखभाल प्राप्त कर रही हैं।
- C-Section की राष्ट्रीय दर: इसके बावजूद सर्वेक्षण ने भारतीय महिलाओं के प्रसव के तरीके में एक चिंताजनक बदलाव को चिह्नित किया है। सिजेरियन सेक्शन (सर्जनी प्रसव) की राष्ट्रीय दर 21.5% से बढ़कर 27.2% हो गई है।
- शहरी बनाम WHO मानक: शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा चिंताजनक रूप से 40% है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा अनुशंसित 10% से 15% की इष्टतम सीमा से काफी अधिक है।
- निजी स्वास्थ्य क्षेत्र की भूमिका: आंकड़े बताते हैं कि यह उछाल विशिष्ट राज्यों में अत्यधिक केंद्रित है और मुख्य रूप से निजी स्वास्थ्य सुविधाओं द्वारा संचालित है, जो प्रसव के संभावित अत्यधिक चिकित्साकरण (over-medicalization) को उजागर करता है।
- मातृ पोषण और TFR में सुधार: मातृ स्वास्थ्य के सकारात्मक पक्ष पर, पोषण संबंधी पहलों का असर दिख रहा है। गर्भावस्था के दौरान कम से कम 100 दिनों तक आयरन-फॉलिक एसिड (IFA) सप्लीमेंट का का सेवन करने वाली माताओं का प्रतिशत पिछले चक्र के 44.1% से बढ़कर 54.9% हो गया है। भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) भी 2.0 पर स्थिर रही, जो जनसांख्यिकीय प्रतिस्थापन स्तर 2.1% से सफलतापूर्वक नीचे बनी हुई है।
सार्वभौमिक टीकाकरण और स्वच्छता (Universal Immunization and Hygiene)
- सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका: NFHS-6 भारत के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रमों में व्यापक सफलताओं पर प्रकाश डालता है, जिसका बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा संभाला गया है। कुल 95.6% बच्चों ने अपने मुख्य टीके सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से प्राप्त किए।
- विशिष्ट टीकों में वृद्धि: लक्षित वैक्सीन अभियानों के बड़े लाभ मिले हैं:
- रोटावायरस वैक्सीन का कवरेज 36.4% से आसमान छूता हुआ 85.4% पर पहुंच गया है।
- खसरा-युक्त टीकों (measles-containing vaccines) की दूसरी खुराक का कवरेज 58.6% से बढ़कर 71.8% हो गया है।
- मासिक धर्म स्वच्छता: इसके अतिरिक्त, सर्वेक्षण में महिलाओं की व्यक्तिगत स्वच्छता में धीमा लेकिन निरंतर सुधार दर्ज किया गया, जहां युवा महिलाओं (15-24 वर्ष की आयु) में स्वच्छ मासिक धर्म सुरक्षा के तरीकों का उपयोग बढ़कर 79.2% हो गया है।
आगे की राह: “दोहरा बोझ” (The Road Ahead: The “Dual Burden”)
- गैर-संचारी रोग (NCDs): मातृ और शिशु देखभाल में सफलताओं के बावजूद, स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट ने भारत की उभरती महामारी विज्ञान (epidemiological) चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया है।
- जीवनशैली से जुड़े जोखिम: NFHS-6 ने स्पष्ट रूप से गैर-संचारी रोगों (NCDs) और जीवनशैली से जुड़े जोखिमों के बढ़ते प्रवाह को रेखांकित किया है।
- नीति निर्माताओं के लिए चुनौती: नीति निर्माताओं को अब एक “दोहरे बोझ” (dual burden) का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है—जहां उन्हें देश भर में वयस्क मोटापे (adult obesity) के बढ़ते संकट से निपटते हुए कुपोषण के स्थायी हिस्सों (pockets) से भी एक साथ लड़ना होगा।
