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आधी रात को भी खटखटाया जा सकेगा अदालत का दरवाजा, सुप्रीम कोर्ट बनाएगा खास SOP

नई दिल्ली: देश के नागरिकों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम उठाने के संकेत दिए हैं। सर्वोच्च अदालत अब एक ऐसी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने पर विचार कर रही है, जिसके तहत आपातकालीन स्थितियों में नागरिक दिन हो या रात, कभी भी अदालत का दरवाजा खटखटा सकेंगे।

यह फैसला उन स्थितियों से निपटने के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है जहां रात के अंधेरे में या छुट्टियों के दिन प्रशासनिक कार्रवाइयां की जाती हैं।

अदालती समय के पार: स्वतंत्रता की रक्षा

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने यह रुख सुप्रीम कोर्ट की वकील माहेरविश रीन की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान अपनाया। याचिका में तर्क दिया गया था कि देर रात होने वाली गिरफ्तारियों, सुबह-सुबह होने वाली मकानों को ढहाने की कार्रवाई (बुलडोजर एक्शन) या वीकेंड और छुट्टियों के दौरान किए जाने वाले देश-निकाले (डिपोर्टेशन) के खिलाफ नागरिकों के पास तुरंत राहत पाने का कोई तय जरिया नहीं है।

अदालत में दलील देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा:

“किसी संवैधानिक लोकतंत्र में, संविधान रात के समय खामोश नहीं बैठ सकता। नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अदालत की सुबह की घंटी बजने का इंतजार नहीं किया जा सकता। न्याय तक पहुंच सिर्फ कागजों पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि जमीनी तौर पर यह हर समय उपलब्ध होनी चाहिए।”

1 घंटे के भीतर एक्शन की तैयारी

सुप्रीम कोर्ट ने इस जरूरत को गंभीरता से स्वीकार किया है। पीठ ने माना कि जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालत के ‘रिस्पॉन्स टाइम’ (जवाब देने की अवधि) को कम करने के लिए एक मजबूत फ्रेमवर्क की जरूरत है।

  • तुरंत सुनवाई: मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने टिप्पणी की, “ऐसी किसी भी आपातकालीन अर्जी पर अदालत की तरफ से संभवतः एक घंटे के भीतर जवाब आ जाना चाहिए।”
  • प्रशासनिक बनाम न्यायिक पेंच: केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुझाव दिया कि यह SOP कोर्ट के प्रशासनिक स्तर पर बनाई जानी चाहिए। हालांकि, सीजेआई ने स्पष्ट किया कि भारत के संघीय ढांचे में हाई कोर्ट सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक नियंत्रण में नहीं आते, इसलिए पूरे देश के लिए इस व्यवस्था को लागू करने हेतु न्यायिक आदेश पारित करना पड़ सकता है।

डिजिटल युग में 24/7 न्याय की राह

सुनवाई के दौरान पीठ में शामिल जस्टिस जोयमाल्या बागची ने एक बेहद महत्वपूर्ण बिंदु उठाया। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल दौर में ई-फाइलिंग की वजह से अदालतें कभी पूरी तरह ‘बंद’ नहीं होती हैं। आपातकाल में एक ईमेल, एक पत्र या सिर्फ एक फोन कॉल ही पूरे जस्टिस सिस्टम को एक्टिव करने के लिए काफी है।

याचिकाकर्ता ने भी इस बात का समर्थन किया कि देश के पास वर्तमान में डिजिटल फाइलिंग, इलेक्ट्रॉनिक कोर्ट रिकॉर्ड और वर्चुअल सुनवाई का बेहतरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। चुनौती बस इस बात की है कि इन आधुनिक तकनीकों को अभी तक एक यूनिफॉर्म फ्रेमवर्क (समान व्यवस्था) में नहीं पिरोया गया है, जिससे कोर्ट के तय कामकाजी घंटों के बाद भी आम नागरिक को तुरंत सुरक्षा मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से उम्मीद बंधी है कि आने वाले समय में देश के किसी भी कोने में, किसी भी वक्त अगर किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो न्यायपालिका हमेशा मुस्तैद मिलेगी।

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