जीवनशैली

वायु प्रदूषण: भारत की सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए ‘मीठा जहर’

नई दिल्ली — हाल ही में, ‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ पत्रिका में प्रकाशित एक अभूतपूर्व अध्ययन में एक विरोधाभास को उजागर हुआ है: जिस वायु प्रदूषण को खत्म करने के लिए हरित ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है, वही प्रदूषण देश के सौर ऊर्जा संयंत्रों के उत्पादन को मीठा जहर की तरह कर कर रहा है।

अकेले वर्ष 2023 में, हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों—जिन्हें एरोसोल (aerosols) कहा जाता है—ने भारत के सौर ऊर्जा उत्पादन में 9.6% की कमी की है। यह गिरावट ग्रिड से गायब हुई अनुमानित 15 टेरावॉट-आर (TWh) स्वच्छ बिजली के बराबर है, जो कि सौर पैनलों के कार्यकुशलता (efficiency) का एक ऐसा नुकसान है जो दुनिया में सबसे अधिक माना जा रहा है।

अदृश्य शामियाना

एरोसोल सल्फेट, कार्बन और अन्य औद्योगिक सह-उत्पादों (byproducts) से बने सूक्ष्म कण होते हैं। जब ये वायुमंडल में तैरते हैं, तो एक अनचाही शामियाना के तरह कार्य करते हैं, जो सूर्य की रोशनी को सौर पैनलों तक पहुँचने से पहले ही बिखेर देते हैं और सोख लेते हैं।

इस घटना के आर्थिक और पर्यावरणीय नुकसान का आकलन करने के लिए, शोधकर्ताओं ने उपग्रह और वायुमंडलीय डेटा के साथ-साथ मशीन-लर्निंग मॉडल का उपयोग किया। इसके साथ ही, दुनिया का पहला संयंत्र-स्तरीय (facility-level) डेटाबेस तैयार किया है, जो वैश्विक स्तर पर 1 लाख 40000 सौर संयंत्रों को ट्रैक करता है।

निष्कर्ष बताते हैं कि यह संकट पूरी तरह से क्षेत्रीय है, जिसमें ऊर्जा उत्पादन का सबसे गंभीर नुकसान भारत के अत्यधिक औद्योगिक और घनी आबादी वाले उत्तरी भारत में केंद्रित है। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत ही नहीं विश्व के अन्य देश भी इससे प्रभावित हैं।

वैश्विक स्तर पर यह समस्या बेहद गंभीर है। 2017 और 2023 के बीच, वायुमंडलीय प्रदूषण ने दुनिया भर में मौजूदा सौर बुनियादी ढांचे से औसतन 74 TWh प्रति वर्ष की बिजली छीन ली। इसे समझने के लिए, यह नष्ट हुई ऊर्जा दुनिया भर में नव-स्थापित सौर क्षमता द्वारा सालाना उत्पन्न होने वाली कुल बिजली के लगभग एक-तिहाई के बराबर है।

दो पड़ोसियों की कहानी: भारत बनाम चीन

हालांकि भारत प्रतिशत के मामले में सबसे अधिक गिरावट का सामना कर रहा है, लेकिन उसका पड़ोसी देश चीन एक चेतावनी के साथ ही इस समस्या से निपटने का एक संभावित रूपरेखा (roadmap) दोनों प्रदान करता है।

चूंकि चीन के कई विशाल सौर फार्म पारंपरिक कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के 30 किलोमीटर के दायरे में बने हैं, इसलिए 2023 में दुनिया भर में एरोसोल से होने वाले सौर ऊर्जा के कुल नुकसान में चीन की हिस्सेदारी 54.9% थी। हालांकि, आंकड़ों पर करीब से नज़र डालने से पता चलता है कि दोनों देश अपने आसमान को कैसे संभाल रहे हैं, इसकी दो बिल्कुल अलग-अलग राहें हैं:

2023 सौर संकेतक (Solar Metrics)भारत (India)चीन (China)
कुल उत्पादन (Total Generation)पूर्णतः निर्दिष्ट नहीं793.5 TWh
एरोसोल के कारण नष्ट हुई बिजली~15 TWh61.3 TWh
प्रतिशत कार्यकुशलता हानि9.6% (वैश्विक औसत: 5.8%)7.7%
प्रदूषण का रुझान (2013–2023)स्थिर (कोई सुधार नहीं)सालाना लगभग 1.4% की गिरावट

नीतिगत अंतर (The Policy Cleavage)

इन दो ऊर्जा दिग्गजों के बीच का मुख्य अंतर इंजीनियरिंग में छिपा है। पिछले दशक के दौरान, चीन ने अपने कोयले के उपयोग को बढ़ाया लेकिन साथ ही साथ आक्रामक पर्यावरणीय सुधारों (environmental retrofits) को अनिवार्य कर दिया। उन्होंने कोयला संयंत्रों को उच्च दक्षता वाले फिल्टर और फ़्लू-गैस डिसल्फराइज़ेशन (FGD) इकाइयों से सुसज्जित किया—यह एक प्रमुख तकनीक है जो हवा में छोड़े जाने से पहले उत्सर्जन में से जहरीली सल्फर डाइऑक्साइड को साफ करती है।

इसके परिणामस्वरूप, china का सौर अवरोध (solar blockage) साल-दर-साल कम हुआ है। इसके विपरीत, भारत का एरोसोल-प्रेरित सौर ऊर्जा नुकसान इसी दस साल की अवधि में पूरी तरह से स्थिर रहा। इसके समाधान के लिए कड़े कदम उठाने के बजाय, नई दिल्ली ने एक रक्षात्मक नीतिगत बदलाव को चुना। वर्ष 2025 में, भारत सरकार ने अपने स्वच्छ-हवा लक्ष्यों को काफी हद तक कम कर दिया और अनिवार्य FGD प्रतिष्ठानों को केवल बड़े महानगरीय क्षेत्रों या गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों के पास के कोयला संयंत्रों तक ही सीमित कर दिया।

भारत की वर्तमान रणनीति एक स्पष्ट प्रणालीगत टकराव (systemic friction) पैदा करती है। देश कोयले को बदलने के लिए सौर क्षमता को बढ़ाने पर अरबों खर्च कर रहा है, लेकिन मौजूदा कोयला संयंत्रों के लिए उत्सर्जन मानकों को ढीला करके, नीतिगत विकल्प उसी स्मॉग (धुंध) को इन नए हरित निवेशों की कार्यकुशलता को नुकसान पहुँचाने की अनुमति दे रहे हैं। जब तक उत्तरी भारत का आसमान साफ नहीं हो जाता, तब तक देश का सौर बुनियादी ढांचा एक हाथ बंधे होने जैसी स्थिति में ही काम करता रहेगा।

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