नवीकरणीय ऊर्जा की भू-राजनीति
हाल ही में, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने नवीकरणीय ऊर्जा सहित विश्व के ऊर्जा परिदृश्य पर ‘वर्ल्ड एनर्जी इनवेस्टमेंट 2026‘ रिपोर्ट जारी की। इसके अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा और विद्युतीकरण (electrification) में किए गए निवेश ने भारत सहित दुनिया के पांच सबसे बड़े ईंधन आयातकों को वर्ष 2025 में जीवाश्म ईंधन आयात लागत में अनुमानित $260 बिलियन की बचत कराई है। इसने जीवाश्म ईंधन के बदले स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने प्रयासों को मजबूती दी है।
कच्चे तेल की कीमतें लगातार $100 प्रति बैरल के ऊपर बने रहने के कारण, यूरोप, भारत, जापान जैसे देश गंभीर आजीविका संकट (cost-of-living crises) और मुद्रास्फीति का सामना कर रहे हैं। पिछली सदी की तरह, वर्तमान वैश्विक भू-राजनीति भी हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) द्वारा संचालित होती है, जो मुख्य रूप से पाइपलाइनों, समुद्री चोकपॉइंट्स (जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य) और ओपेक (OPEC) जैसे तेल उत्पादक देशों के कार्टेल के इर्द-गिर्द घूम रही है।
हालांकि, नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने के वैश्विक रुझान ने इस रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के ढांचे को मौलिक रूप से बदल दिया है। अब दुनिया का ध्यान तेल के कुओं से हटकर खनिज भंडारों पर और पाइपलाइनों से हटकर प्रौद्योगिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं (technology supply chains) पर केंद्रित हो गया है।
महत्वपूर्ण खनिज: स्वच्छ ऊर्जा के नए आधार स्तंभ
लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट, तांबा (कॉपर) जैसे महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) और दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements – REEs) स्वच्छ ऊर्जा के अपरिहार्य आधार स्तंभ हैं। इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बैटरी, पवन टरबाइन, सौर पैनल और स्मार्ट ग्रिड के निर्माण के लिए इनकी अत्यधिक आवश्यकता होती है।
कच्चे तेल विश्व के विभिन्न देशों में पाये जाते हैं लेकिन महत्वपूर्ण खनिज कुछ ही भौगोलिक क्षेत्रों में अत्यधिक केंद्रित हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनके रिफाइनिंग (शोधन) और प्रसंस्करण (processing) की क्षमता पर तकनीकी रूप से उन्नत देशों का एकाधिकार है:
वर्तमान में वैश्विक खनिज रिफाइनिंग, बैटरी निर्माण और दुर्लभ मृदा प्रसंस्करण पर चीन का पूर्ण दबदबा है। हाल के वैश्विक परिदृश्यों के अनुसार, प्रमुख खनिजों की रिफाइनिंग क्षमता में होने वाली वैश्विक वृद्धि में चीन की हिस्सेदारी लगभग 86% है।
हरित ऊर्जा की ओर बढ़ने के इस सफर में गंभीर भू-राजनीतिक जोखिम भी शामिल हैं। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2025 में, अमेरिकी टैरिफ के जवाब में चीन ने ‘रेयर अर्थ मैग्नेट’ (Rare Earth Magnets) के निर्यात पर रोक लगा दी थी, जिससे दुनिया भर में रक्षा और स्वच्छ गतिशीलता (clean mobility) क्षेत्रों के लिए बड़े आपूर्ति श्रृंखला झटके (supply chain shocks) पैदा हो गए थे।
भारत की स्थिति: लक्ष्य और चुनौतियाँ
भारत के लक्ष्य काफी महत्वाकांक्षी हैं: 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता और 2070 तक नेट-जीरो (शुद्ध-शून्य उत्सर्जन) हासिल करना। हालांकि, भारत का यह ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला में उतार-चढ़ाव के प्रति बेहद संवेदनशील है:
- 100% आयात निर्भरता: भारत वर्तमान में लिथियम, कोबाल्ट और निकेल के लिए अपनी आवश्यकताओं का लगभग 100% आयात करता है। महत्वपूर्ण खनिजों का बाजार अपेक्षाकृत छोटा और अपारदर्शी है। इस बाजार पर एकाधिकार रखने वाले देश या संस्था कृत्रिम रूप से कीमतों को अचानक गिरा सकते हैं। इसके कारण भारत की नई और शुरुआती खनन परियोजनाएं व्यावसायिक रूप से घाटे में चली जाएं और भारत को अपनी निर्भरता जारी रखने के लिए मजबूर होना पड़े।
- प्रसंस्करण क्षमता की कमी: हालांकि भारत ऊर्जा संक्रमण के लिए आवश्यक खनिजों के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, लेकिन वास्तव में उसके पास तांबा (164 मिलियन टन) और ग्रेफाइट (211 मिलियन टन) जैसे खनिजों के बड़े, अनछुए घरेलू भंडार मौजूद हैं, जो देश में डाउनस्ट्रीम प्रसंस्करण (processing) क्षमता की कमी को उजागर करते हैं।
भू-राजनीतिक सुरक्षा के लिए भारत के निर्णायक कदम (2024–2026)
इन भू-राजनीतिक कमजोरियों से निपटने के लिए, भारत ने 2024 और 2026 के बीच बड़े और निर्णायक कदम उठाए हैं:
- राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (National Critical Mineral Mission- NCMM): इसे 2025 की शुरुआत में मंजूरी दी गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिज से संबंधितएक घरेलू मूल्य श्रृंखला (domestic value chain) का निर्माण करना है। यह घरेलू खोज (exploration), विदेशी संपत्तियों के अधिग्रहण और प्रसंस्करण बुनियादी ढांचे को एकीकृत करता है। सरकार ने महत्वपूर्ण खनिजों को परमाणु खनिजों की सूची से हटाने के लिए कानूनों में संशोधन किया है, जिससे उन्हें निजी भागीदारी के लिए खोल दिया गया है। 2024 के बाद से दर्जनों महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉकों की सफलतापूर्वक नीलामी की जा चुकी है।
- REPM विनिर्माण योजना: 2025 की वैश्विक आपूर्ति कटौती से सबक लेते हुए, भारत ने स्थानीय स्तर पर ‘रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स’ (REPMs) के लिए एक एकीकृत विनिर्माण क्षमता बनाने के लिए ₹7,280 करोड़ की योजना शुरू की है। यह पवन टरबाइन, ईवी (EV) और रक्षा क्षेत्र के लिए आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करेगी।
- दुर्लभ मृदा गलियारे (Rare Earth Corridors): केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित ये विशेष गलियारे ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में खनिज समृद्ध तटीय क्षेत्रों के पास खनन, प्रसंस्करण और आरएंडडी (R&D) को एक क्लस्टर के रूप में विकसित करेंगे।
- अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन और “फ्रेंडशोरिंग” (Friendshoring): भारत ‘मिनरल सिक्योरिटी पार्टनरशिप’ (MSP) का सक्रिय सदस्य बन चुका है। यह अमेरिका के नेतृत्व में 14 देशों का एक रणनीतिक गठबंधन है जिसका उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन से दूर हटाकर विविधता लाना है।
- क्वाड और केबिल (KABIL) की पहल: क्वाड देशों (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया) ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने के लिए $20 बिलियन की क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव की घोषणा की। इसी के साथ, भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की संयुक्त उद्यम कंपनी ‘खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड’ (KABIL) अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया और चिली जैसे संसाधन-समृद्ध देशों में लिथियम और कोबाल्ट संपत्तियों को हासिल करने के लिए जमीन पर सक्रिय रूप से काम कर रही है।
- रीसाइक्लिंग और सेकेंडरी रिकवरी: चूंकि जमीन के भीतर गहराई में होने वाले घरेलू खनन की परिपक्वता अवधि (gestation period) लंबी होती है, इसलिए भारत रीसाइक्लिंग के जरिए खनिजों की दोबारा रिकवरी को आक्रामक रूप से बढ़ावा दे रहा है। 2025 के अंत में, कैबिनेट ने घरेलू स्तर पर महत्वपूर्ण खनिजों को पुनः प्राप्त करने के लिए ‘एंड-ऑफ-लाइफ’ (EoL) लिथियम-आयन बैटरी और ई-कचरे के रीसाइक्लिंग के लिए ₹1,500 करोड़ की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है।
संक्षेप में कहें तो, वैश्विक ऊर्जा की बिसात पर अब मोहरे पूरी तरह बदल चुके हैं—कल तक जो जंग कच्चे तेल के कुओं और समुद्री चोकपॉइंट्स के लिए थी, आज वह महत्वपूर्ण खनिजों के भंडार और उनकी प्रसंस्करण क्षमता पर आकर टिक गई है। चीन के कड़े एकाधिकार और आपूर्ति श्रृंखला के अप्रत्याशित झटकों के बीच, भारत के नीतिगत दर्शाते है कि नई दिल्ली अब वैश्विक संकटों के भरोसे बैठने को तैयार नहीं है।
वित्तीय पैकेजों, ‘फ्रेंडशोरिंग’ और रीसाइक्लिंग जैसे चौतरफा रणनीतिक कदम इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अपनी ‘ऊर्जा संप्रभुता’ (Energy Sovereignty) को लेकर गंभीर है। हालांकि, इन महत्वाकांक्षी योजनाओं की असली परीक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि ये नीतियां कितनी तेजी से जमीन पर उतरती हैं, ताकि भारत के 2030 और 2070 के हरित लक्ष्यों को किसी भी बाहरी भू-राजनीतिक चक्रव्यूह से पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सके।
