IMD ने मानसून पूर्वानुमान घटाकर 90% किया
नई दिल्ली: भारत के कृषि क्षेत्र को एक शुष्क गर्मी का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ सकता है, क्योंकि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने शुक्रवार को आधिकारिक तौर पर 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए अपने पूर्वानुमान को कम कर दिया है। मौसम एजेंसी ने अब दीर्घकालिक औसत (LPA) की केवल 90% वर्षा का अनुमान लगाया है, जो अप्रैल में अनुमानित 92% से एक चिंताजनक गिरावट है। इसके साथ ही विभाग ने पुष्टि की है कि केरल में मानसून के आगमन में देरी होगी।
यह पूर्वानुमान मानसून सीजन के “सामान्य से कम” (below-normal) रहने की संभावना को पुख्ता करता है, जिससे भारत का प्राथमिक जल स्रोत कमी (डेफिसिट) के क्षेत्र के करीब पहुंच गया है और पूरे उपमहाद्वीप में सूखे का खतरा मंडराने लगा है।
केरल में आगमन में दुर्लभ चूक (A Rare Miss on Kerala Onset)
- आगमन की तारीख आगे बढ़ी: IMD ने स्वीकार किया कि मानसून अपने मूल 26 मई के पूर्वानुमान के चार दिनों के भीतर केरल में दस्तक नहीं दे पाएगा। अब इसके आगमन को जून के पहले सप्ताह तक के लिए टाल दिया गया है।
- ऐतिहासिक चूक: मौसम एजेंसी के लिए यह एक दुर्लभ गलत अनुमान है; पिछली बार IMD ने 2015 में केरल में मानसून के आगमन को लेकर ऐसी चूक की थी।
- अधिकारियों का पक्ष: IMD के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने एजेंसी की ट्रैकिंग का बचाव करते हुए कहा, “ऐसा कभी-कभी होता है। लेकिन अगर आप देखें, तो मानसून प्रणाली लगातार आगे बढ़ रही है। यह केरल तट से मुश्किल से 100 किमी दूर है। मैंने सात दिन कहा है, लेकिन यह किसी भी समय तट को पार कर सकता है।”
- हवाओं की कमजोरी: चेन्नई में IMD के क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र के प्रमुख और विभाग के सांख्यिकीय पूर्वानुमान मॉडल के सह-लेखक डी.एस. पई ने अधिक सूक्ष्म मौसम संबंधी तस्वीर पेश की। उन्होंने बताया कि हालांकि मानसून समय पर अंडमान सागर पहुंच गया था, लेकिन आवश्यक वायुमंडलीय गतिशीलता रुक गई है। पई ने नोट किया, “सिर्फ एक ही बात है कि हवा मजबूत नहीं हुई है।”
अल नीनो और सूखे की आशंका (El Niño and the Spectre of Drought)
- अल नीनो मुख्य कारक: पूर्वानुमान में इस कटौती का मुख्य कारण उभरता हुआ अल नीनो है, जो भारतीय मानसून को दबाने के लिए जाना जाता है। IMD का अनुमान है कि इस सीजन में अल नीनो की स्थिति हावी रहने की 92% संभावना है।
- न्यून मानसून की उच्च संभावना: नतीजतन, IMD ने “न्यून” (deficient) मानसून—जिसे LPA के 90% से कम वर्षा के रूप में परिभाषित किया गया है—की संभावना को उच्च स्तर यानी 60% पर रखा है।
- शब्दावली में अंतर: हालांकि मौसम विज्ञान एजेंसी अपने आधिकारिक शब्दकोश में “सूखा” (drought) शब्द से पूरी तरह बचती है और यह जिम्मेदारी कृषि मंत्रालय पर छोड़ देती है, लेकिन इसके निहितार्थ बेहद गंभीर हैं।
- 2015 जैसी चिंताजनक मिसाल: मुख्य भूमि पर मानसून के पहुंचने से पहले ही दो बार कमी की चेतावनी जारी करना एक चिंताजनक मिसाल है, जो इससे पहले केवल 2015 में देखी गई थी। ऐतिहासिक समानताएं असहज करने वाली हैं: 2015 में भी आगमन का अनुमान आगे बढ़ा था (30 मई से बदलकर 5 जून) और अप्रैल के पूर्वानुमान में कटौती की गई थी, जिसका अंत अंततः केवल 86% वर्षा के साथ हुआ था। 2014 में हुई 88% वर्षा के साथ मिलकर, इसके परिणामस्वरूप अल नीनो के कारण लगातार दो वर्षों तक न्यून मानसून दर्ज किया गया था।
क्षेत्रीय असमानताएं और कृषि संबंधी चेतावनी (Regional Disparities and Agricultural Alarm)
अपेक्षित वर्षा का भौगोलिक वितरण देश के किसानों के लिए एक चिंताजनक तस्वीर पेश करता है:
- असंतुलित वितरण: भारत के चार व्यापक भौगोलिक क्षेत्रों में से केवल पूर्वोत्तर (Northeast) में ही “सामान्य” मानसून रहने का अनुमान है।
- मुख्य कृषि क्षेत्रों में कमी: उत्तर-पश्चिम, मध्य भारत, दक्षिणी प्रायद्वीप और महत्वपूर्ण ‘मानसून कोर ज़ोन’—जो देश की अधिकांश वर्षा-आधारित कृषि भूमि का भरण-पोषण करता है—सभी क्षेत्रों में पानी की कमी का सामना करने की आशंका है।
- जून का पूर्वानुमान: अकेले जून के महीने में वर्षा इसके ऐतिहासिक औसत के 92% से नीचे रहने का अनुमान है।
- अंतः-मौसमी कारक (Wildcards): क्या 2026 का सीजन 2015 जैसी तबाही को दोहराएगा, यह अब अंतः-मौसमी अप्रत्याशित कारकों पर निर्भर करता है। एक सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव (Positive IOD) या एक अनुकूल मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) प्रणाली में आवश्यक नमी ला सकते हैं, लेकिन वर्तमान में ये दोनों परिघटनाएं अनुपस्थित हैं।
कृषि विशेषज्ञों की चेतावनी: “समस्या केवल वर्षा की कुल मात्रा में कमी की नहीं है, बल्कि इसके वितरण के तरीके की भी है। फसलएं लगभग एक सप्ताह के शुष्क दौर (dry spells) को सहन कर सकती हैं। उससे आगे जाने पर मिट्टी उनका समर्थन करने में असमर्थ हो जाती है। अपर्याप्त वर्षा भूजल पुनर्भरण को रोकेगी, जिससे धान और अन्य फसलों सहित सिंचित फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं।” — जी.वी. रामंजनेयुलु, सतत कृषि केंद्र (Centre for Sustainable Agriculture) के कार्यकारी निदेशक
चूंकि बारिश के बादल मालाबार तट से 100 किलोमीटर दूर थमे हुए हैं, इसलिए आने वाले सप्ताह भारत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।
